Tuesday, November 16, 2021

बैंक: भरोसे के प्रतीक


 बैंक: भरोसे के प्रतीक



चार दशक तक (1974 से 2013) बैंक में नौकरी की। फिर एक बिज़नेस स्कूल में बैंकिंग डिपार्टमेंट की स्थापना की। पिता जी भी बैंक में थे और दादा जी भी।  भाई भी बैंक में था।  ताया  जी और चाचा  जी ने भी बैंक की नौकरी ही की। कुछ समय के लिए बेटे ने भी बैंक में नौकरी की।  बैंक की नौकरी जैसे पारिवारिक  पहचान हो गई।  आज बैंक के बारे में कुछ विचार साँझा करता हूँ।  


धन व्यक्ति को बहुत प्रिय होता है। वह उस को संभाल कर रखना चाहता है। चोरी हो जाने का डर भी बना रहता है। घर में पड़ा हो तो फिजूल खर्च भी हो जाता है। हमें चाहिए एक ऐसी संस्था जो हमारे धन को सुरक्षित रखे और जब चाहिए वापिस भी कर दे। बैंक ही ऐसी संस्था हैं जो ऐसा करती है। बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के अनुसार बैंक वह संस्था है जो धन राशि को लेकर यह वायदा करती है कि जब भी जमाकर्ता को चाहिए उसे वापिस दे देगी।   


क्या सिर्फ कानून बना देने से कोई संस्था भरोसेमंद हो सकती है। नहीं। इस के लिए आवश्यक है कि बैंक इस तरह के नियम और कार्यप्रणाली अपनाएं जिस से बैंक धन को सुरक्षित रख सकें और जब भी जमाकर्ता को चाहिए उसे उपलब्ध करवा सके। क्या मात्र नियम और कार्यप्रणाली बनाने से बैंक भरोसे के प्रतीक हो सकते हैं। नहीं। बैंक में कार्य करने वाले व्यक्ति भरोसे के प्रतीक होने चाहिए। तभी यह संभव है। 


आजकल भारत में 135 बैंक हैं जिनमें से 12 राष्ट्रीकृत बैंक हैं और 23 निजी क्षेत्र के बैंक। अधिकाँश बैंक कारोबार इन के पास ही है।  इस के अतिरिक्त 15 छोटे और पेमेंट बैंक हैं, 43 विदेशी बैंक और 42 कोआपरेटिव बैंक हैं। क्या देश में सब को बैंक सुविधा सुलभ है? इस मामले में हाल के वर्षों में काफी उपलब्धि हुई है परन्तु अभी भी काफी कुछ करना बाकी है।   अधिकांश हर कसबे और शहर में हर गली बाजार में कोई ना कोई बैंक अवश्य है। देश की 2.50 लाख पंचायतों में अधिकाँश में बैंक है और जहाँ नहीं है वहां पर बैंकों ने आपने प्रतिनिधि बैठा रखें हैं लेन देन करने के लिए।  डाक खानों को भी बैंक सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए कहा गया है।  


परंतु यह सब पर्याप्त नहीं। देश के नागरिक को बैंक सिर्फ इस लिए नहीं चाहिए कि वह अपना धन वहां सुरक्षित रख पाए। उसे इस लिए भी बैंक चाहिए कि वह धन का स्थानातरण कर पाए और समय समय पर ऋण भी चाहिए। और भी वित्तीय सेवाएं चहिए जो बैंक में तो नहीं परंतु चाहिए। पेंशन चाहिए, बीमा चाहिए। 


सन  2000 में मैं पंजाब नेशनल बैंक की दिल्ली में चांदनी चौक शाखा का मुख्य प्रबंधक था। मैंने देखा कि दिल्ली, जो कि देश की राजधानी है और चांदनी चौक जो इस का मुख्य व्यवसाय केंद्र है उस में अनेकों मजदूर सड़क पर सोने को मजबूर थे। सारे दिन की कमाई अगर वह आपने पास रखते तो कोई गुंडा आ कर ले जाता। उन के बैंक खाते कम ही खुलते थे। वह मजबूरन आपने सारे दिन की मेहनत की कमाई किसी दुकानदार के पास रखते और इस  के लिए उन्हें फीस देनी पड़ती थी। फिर अगर इन को यह धन आपने गांव भेजना होता था तो उस की अलग फीस। 2014 में देश में जनधन स्कीम लागू होने के पश्चात इनको कुछ राहत मिली है। 


असल में देखा जाए तो भारत में आधुनिक बैंक 200 वर्ष से कम समय से हैं। अंग्रेजों ने आधुनिक बैंक स्थापित किए। शुरू शुरू में तो बैंक सुविधा मात्र अंग्रेजी कंपनियों को ही उपलब्ध थी या उन को जो अंग्रेजी कंपनियों के साथ व्यापार करते थे। 1895 में देश के स्वंत्रता सैनानियों ने पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना इस उद्देश्य से की कि भारतीय मूल के व्यापारी भी बैंक सुविधा का लाभ ले पाएं। 1969 में देश के 14 मुख्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया तो बैंक सुविधा किसानों और लघु उद्यम को भी उपलब्ध हुई। 2010 से चालू और 2014 से और जोर से चालू कर जन धन स्कीम कार्यरत हुई। अब बैंक सुविधा जनसाधारण को सुलभ है। परंतु ऋण, पेंशन और बीमा अभी पूरी तरह से नहीं। 


गत 125 वर्ष के बैंक इतिहास का मैं और मेरे पूर्वज साक्षी हैं। कुछ दंतकथाएं मैने आपने दादा और पिता जी से सुन रखी हैं और 1974 से तो मैं खुद गवाह हूं। अब से कुछ लेख लिख कर मैं बैंक के 125 वर्ष के इतिहास की कुछ रोचक आपबीती सांझा करूंगा। आशा करता हूं आप को पसंद आएगी।


सतीश कालड़ा

बैंगलोर

05.11.2021