Friday, December 10, 2021

पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा कसम खुदा से कम भी नहीं।

 पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा कसम 

खुदा से कम भी नहीं।


किसी ने खूब कहा है: "पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा कसम खुदा से कम भी नहीं।" क्या अदभुद चीज़ का अविष्कार किया है इंसान ने। कागज़ के टुकड़े पर सब को यकीन हो गया है। रोटी, कपड़ा, मकान, जमीन, जायदाद, सोना, चांदी, हीरे, मोती, जवाहर हम सब इन कागज़ के टुकड़ों के बदले खरीद बेच लेते हैं। और इस से भी बड़ कर विश्वास है हमें आपने बैंक बैलेंस पर। रुपया पैसा तो फिर भी वह कागज़ है जिस के ऊपर रिजर्व बैंक के गवर्नर का आश्वासन हस्ताक्षर सहित दर्ज रहता है। बैंक में रखे पैसे की तो हम कई बार रसीद भी नहीं लेते। पासबुक भी पूरी नहीं करवाते। बस हमें विश्वास है कि बैंक में रखा धन जब हम चाहे मिल जाएगा। बैंक में रखा रुपया पैसा हमें ऐसे लगता है कि जैसे हमारी जेब में ही पड़ा है। जब चाहे जहां से चाहे निकलवा लो: एटीएम से, बैंक से,  डेबिट कार्ड से या QR कोड से। 


गत दो किश्तों में मैने जिक्र किया था कि बैंक दो काम करते हैं: आप बैंक में अपना धन जमा करा सकते हैं और दूसरा वहां से ऋण ले सकते हैं। आज की किश्त में जिक्र करूंगा कि बैंक के द्वारा आप धन का भुगतान कर सकते हैं।


बैंक में आप का धन आप के खाते में सुरक्षित है। फिर बैंक आप के आदेश अनुसार इस का भुगतान करते हैं। आप स्वयं बैंक में जाकर नकदी निकाल सकते हैं या आप आपने खाते से चेक काट कर किसी को दे सकते हैं। आप का चेक बैंक के लिए आदेश है कि वह आप के खाते से पैसा निकाल कर उस को दे दे जिस का नाम चेक के ऊपर अंकित है। चेक भुगतान के कुछ नियम हैं जिस के अनुसार चेक का भुगतान नकदी में भी हो सकता है या उस व्यक्ति या संस्था के खाते में भी जमा हो सकता है जिस के नाम का वह चेक है। इन नियमों के लिए सरकार ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट के नाम से कानून भी बनाया है। इस कानून के तहत चेक काट कर देने का मतलब है कि देनेवाला लेनेवाले को आश्वासन देता है कि उसके बैंक खाते में इतना पैसा है जिस से चेक का भुगतान हो जाएगा। इस कानून में यह भी प्रावधान है कि अगर भुगतान ना हुआ तो चेक काटने वाले को सजा भी हो सकती है। 


अगर लेने वाले को देने वाले पर विश्वास ना हो तो बैंक से ड्राफ्ट भी लिया जा सकता है। ड्राफ्ट भी एक तरह का चेक ही है जो कि बैंक के द्वारा जारी किया जाता है। ड्राफ्ट जारी करने से पहले बैंक धनराशि जमा कर लेते हैं।  क्योंकि बैंक भरोसे के प्रतीक माने जाते हैं इस लिए ड्राफ्ट की मंजूरी तुरंत हो जाती है। 


इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और कंप्यूटर मोबाइल के इस युग में भुगतान करने के नए नए विकल्प पैदा हुए हैं। बैंकों ने आपने रिकॉर्ड ना केवल कंप्यूटरीकृत कर लिए हैं बल्कि केंद्रित भी कर लिए हैं जिस के द्वारा आप अपना खाता कहीं से भी ऑपरेट कर सकते हैं। अब चेक द्वारा भुगतान की जगह धन का इलेक्ट्रॉनिक फंड  ट्रांसफर होने लगा है। आप आपने मोबाइल या लैपटॉप का प्रयोग कर इंटरनेट बैंकिंग का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसका मतलब है कि आप आपने लैपटॉप या मोबाइल में ही आपने बैंक के बैलेंस को देख सकते हैं और फिर वहीं से जिस को भुगतान करना है कर सकते हैं। सुरक्षा के लिए बैंक कई विकल्प देता है। इस सुविधा का प्रयोग करने के लिए उचित सुरक्षा निर्देश या नियमो का पालन करते रहना चाहिए। 


बैंक से धनराशि भुगतान के लिए रिजर्व बैंक की देख रेख में एक नई संस्था बनाई गई है जिस का नाम है नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI).  इस संस्था की देखरेख में भुगतान के कई और विकल्प भी सामने आए हैं जैसे कि RTGS, NEFT, IMPS, AEPS, UPI payments, Bill Payments इत्यादि। इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग के जरिए एक साथ अनेक लोगों को पैसे भेजे जा सकते हैं। एनपीसीआई ने Rupay कार्ड का प्रचलन भी शुरू किया है। इस कार्ड से हम एटीएम या पोस टर्मिनल्स से भुगतान कर सकते हैं। Rupay कार्ड आने से पहले डेबिट या क्रेडिट कार्ड के लिए विदेशी कंपनियों के कार्ड ही सुलभ थे: जैसे कि वीजा और मास्टरकार्ड। परंतु एनपीसीआई से देशी कार्ड का प्रचलन काफी बड़ गया है। अब किसानों के लिए किसान कार्ड और लघु उद्यमी लोगो के लिये भी विशेष कार्ड उपलब्ध हैं। 


बैंक अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं। बैंक ना हो तो व्यापार और अर्थव्यवस्था में धन का लेन देन होना संभव ना हो। व्यापार का आधार धन का लेन देन ही तो है। अजीब सी बात है कि बैंकों के इतने विकास के बाद भी कई लोग अभी भी नकदी में लेन देन करते हैं और नकदी को लाने ले जाने में कितना जोखाम लेते हैं। यह काले धन का चलन शायद इसलिए भी है कि एक नंबर में लेन देन करने से कर का भुगतान करना पड़ता है। जमीन जायदाद की खरीद में नकदी का प्रयोग लोग करते हैं क्योंकि कीमत ज्यादा होती है और रजिस्ट्रेशन के चार्जेस 6 से 8% होते हैं।  परंतु नकदी के लेन देन में जोखम तो है ही। रिश्वतखोरी भी नकदी में होती है और भारत में भ्रष्टाचार तो है ही। 


कुछ व्यापारी ऐसे भी हैं जो नकदी का भुगतान एक शहर में लेकर दूसरे शहर में आपने एजेंट के द्वारा करवा देते हैं।  परंतु यह सरकार द्वारा मान्य नहीं है। सरकार के नियमों के अनुसार एक निर्धारित सीमा तक ही नकदी में लेन देन हो सकता है। यह सीमा शायद अभी भी पचास हजार रुपए से कम ही है। कई लोगों ने इस प्रावधान का प्रयोग करके टैक्स बचाने के चोर रास्ते निकाल रखे हैं। छोटे शहरों से खुदरा व्यापारी पचास हजार से कम राशि के 10, 20 ड्राफ्ट बना कर बड़े शहर में माल लेने आता है और इन ड्राफ्ट द्वारा भुगतान कर देता है। ड्राफ्ट छः महीने तक मान्य होते हैं। तो छः महीने तक यह ड्राफ्ट नकद नोटों की तरह ही प्रयोग में लिए जाते हैं। परन्तु यह सब गैर कानूनी है। 


जनता को विदित है कि बैंक सुविधा सुलभ है।  नकदी का गैर कानूनी लेन देन और जोखम भरा कृत्य करने से परहेज करें। टैक्स प्लानिंग के लिए आपने चार्टर्ड अकाउंटेंट से संपर्क रखें। सरकार से भी अनुरोध है कि टैक्स के ऐसे प्रावधान बनाए जाएं जिस से जनता को नकदी का प्रयोग कम से कम करना पड़े। रिश्वतखोरी के ऊपर भी सख्ती करनी चाहिए। बैंकों से भी अनुरोध है कि लेन देन पर खर्चा कम से कम लें ताकि जनता बैंकों द्वारा ही लेन देन करे। 


हाल ही में सरकार ने विशेष बैंक बनाए हैं जिन का काम ही लेन देन करना है (पैमेंट बैंक)। पेटीएम, गूगलपे आदि कई विकल्प सामने आए हैं। अब तो पान खरीद कर भी लोग पेटीएम या गूगलेपे करते हैं। परंतु अजीब सी बात है कि डाक खाने में या सरकारी दफ्तरों में अभी भी नकदी जमा करवानी पड़ती है।  हम उम्मीद करते हैं कि सरकार आपने संस्थानों में भी नकदी का इस्तेमाल कम करके नए विकल्प के लिए मार्ग खोलेगी और हमारी अर्थव्यवस्था जल्द से जल्द कैश लैस तो नहीं हो सकती परंतु न्यूनतम नकदी की तरफ अग्रसर होगी। 


सतीश कालड़ा

बैंगलोर

02.12.2021


Seema Sandesh, Sriganganagar 11.12.2021




बैंक में सब से अधिक भरोसेमंद पद: कैशियर

 बैंक में सब से अधिक भरोसेमंद पद:  कैशियर


Seema Sandesh, Sriganganagar

बैंक में सब से अधिक भरोसेमंद पद होता है  कैशियर का। बैंक में हर तरह की धन दौलत होती है परंतु विशेषत नकद कैश प्रचुर मात्रा में होता है और उस को कैशियर ही संभालते हैं। 


कहीं से कोई ऐसी दवा दारू नहीं मिलती जिस को पिला दिया जाए तो  स्टाफ संस्कारी, जिम्मेदार और भरोसेमंद  हो जाए। इस के लिए संस्था में कल्चर बनाना पड़ता है। बैंकों में ईमानदारी को इनाम मिले या ना मिले परंतु बेइमानी के लिए जीरो टॉलरेंस की पॉलिसी अपनाई जाती है। ऐसा नहीं कि बैंकों में कभी कोई बेइमानी की कोशिश नहीं करता। जहां गुड होता है मक्खियां आ ही जाती हैं। किसी के दिल में लोभ लालच आ भी सकता है। किसी की गलती तो माफ हो सकती है परन्तु बेइमानी कतई नहीं।


कैशियर बनते ही उसे संस्कार दिए जाते हैं। कोई किताब के पाठ नहीं पढ़ाए जाते। बल्कि बैंक के वर्तमान कैशियर नए कैशियर को सीख देते हैं भरोसेमंद होकर रहने की। बैंक में इतना कैश होता है कि जैसे सब्जी मंडी में व्यापारी के आगे सब्जी का ढेर। परंतु कैशियर के लिए वह सारा कैश कागज़ के टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं। जिस तरह जल में रहते हुए भी कमल के पत्ते के ऊपर जल नहीं टिकता इसी तरह कैशियर के मन को बैंक के कैश से निर्लिप्त भाव रहता है। हो सकता है उस की जेब में घर जाने के लिए बस का किराया भी ना हो। परंतु बैंक के कैश से वह निर्लिप्त ही रहता है। 


बैंक कैश के ऊपर चोर लुटेरों की नज़र भी रहती है परंतु आजतक कोई चोर या डाकू बैंक नकदी लूट कर बच कर नहीं पाया। देश में सब से बड़ा डाका पंजाब नैशनल बैंक लुधियाना की एक शाखा में पड़ा था। बैंक में 15 करोड़ कैश था। लुटेरों ने 5.70 बोरियों में भर लिया। और उनके पास कैपेसिटी नहीं थी। लुटेरे जब पकड़े गए तो उन्हों ने बताया कि उन्हों ने स्टाफ को खुली छूट दी कि जिस को जितना कैश चाहिए ले लो। परंतु स्टाफ की ईमानदारी थी कि उन्हों ने एक रुपया भी नहीं लिया। 


नकली कैश की चपेट में कई कैशियर आ जाते हैं। वैसे तो काम करते करते कैशियर को असली नकली की खूब पहचान हो जाती है। परन्तु दुश्मन देश कई बार नकल भी असल जैसे बना देते हैं। पुलिस नकली कैश पकड़े जाने पर कैशियर को बहुत तंग करती है। कई बार तो मामला हाई कोर्ट तक जाता है। 


बैंक का कैशियर आसानी से छूटी नहीं ले सकता क्योंकि उस के पास बैंक कैश का चार्ज होता है और उसे रोज समय पर जाकर कैश सेफ खोलना होता है ताकि किसी ग्राहक को दिक्कत ना हो। अगर उसे छूटी लेनी हो तो उसे सारे कैश का चार्ज किसी और को देना होता है तभी वह छूटी ले पाता है। 


एक ज़माना था कि बैंक का कैश ठेकेदार के हवाले कर दिया जाता था। कैश कम हो या ज्यादा ठेकेदार की जिम्मेदारी रहती। कैश महकमें के मुलाज़म भी ठेकेदार के होते थे। ठेकेदार देख भाल कर उन को नौकरी देता था। 1923-40 के दशकों में मेरे दादा जी पंजाब नेशनल बैंक, लाहौर में कैश कांट्रेक्टर हुआ करते थे। आजकल भी इस का कुछ रूप सामने आया है। जनधन स्कीम के तहत बैंको ने बिजनेस कॉरेस्पोंडेनट (BC) नियुक्त किए हैं। BC आपने कैश का खुद जिम्मेदार होता है। BC के पास जो कैश जमा होता है उस के व्यक्तिगत खाते से उतना धन निकाल दिया जाता है और जब वह कैश का भुगतान करता है तो उस के खाते में उतना धन जमा कर दिया जाता है। 


सतीश कालड़ा

बैंगलोर

06.11.2021


बैंक जैसा ऋणदाता कोई नहीं

 बैंक जैसा ऋणदाता कोई नहीं

Seema Sandesh, Sriganganagar


बैंक वह संस्था है जहां पैसा जमा करने से सुरक्षित रहता है और ब्याज भी मिलता है। परंतु बैंक आप से पैसा लेकर उसका क्या करते हैं?  और आप को ब्याज कैसे दे देते हैं?  जबकि सुरक्षा प्रधान करने के लिए कमीशन लेनी चाहिए। हकीकत यह है कि बैंक ऋण देते हैं। ऋण देने से जो ब्याज की कमाई होती है उसमें से जमाकर्ता को भी ब्याज दे देते हैं। यह सिलसिला बहुत दिलचस्प है। मान लो एक लाख लोगों ने बैंक के पास धन जमा किया।  और बैंक वायदा करता है कि जमाकर्ता जब भी पैसे वापिस मांगेगा उस को दे दिए जाएंगे।  अब सब के सब जमाकर्ता बैंक के पास एक साथ तो धन निकालने के लिए जाते नहीं।  तो बैंक कुछ धन को रिज़र्व में रख कर बाकी के   धन को आगे ऋण देने में प्रयोग कर लेता है।  इस ऋण से जो व्याज अर्जित होता है उस में से जमाकर्ता को ब्याज दे दिया जाता है और बैंक प्रबंधन के खर्चे भी निकल जाते हैं।  


बैंक ऋण देने का जोखम ले लेते हैं और उनके पास ऋण देने की क्षमता भी होती है और ऋण देकर वसूल करने की कला भी। और सरकार भी बैंक की मदद करती है।   जी हां ऋण देना एक जोखम है और बैंक इस जोखम को लेने की कला में निपुण होते हैं। बैंक विभिन्न तरह के ग्राहकों और व्यवसायों का समय समय पर जोखम आंकते रहते हैं। 


तो वह कौन हैं जिन को बैंक ऋण देने के लिए सही मानते हैं और किस काम के लिए ऋण मिल सकता है। बैंक प्राय ऋण किसी व्यापार के लिए देते हैं। 


कौन है जिस को बैंक से ऋण नहीं चहिए। किसान को खेती के लिए, गाय, भैंस, बकरी पालन के लिए ऋण चाहिए। व्यापारी को व्यापार करने के लिए। उद्योगपति को उद्योग के लिए। नौकरी पेशा आदमी को घर खरीदने  के लिए ऋण चाहिए और घर के साजो सामान और कार स्कूटर के लिए भी ऋण चाहिए। बच्चों को पढ़ाई के लिए ऋण चाहिए।


अगर आप बैंक ऋण लेना चाहते हैं तो यह आप के हित में है कि आप बैंक में आप अपनी साख बना कर रखें। कई लोग इस गलतफहमी का शिकार बने रहते हैं कि उन्हों ने बैंक से ऋण ले लिया अब वापिस करना है तो बैंक उनके चक्कर निकालता रहे। असल में ऐसा करने से बैंक में उनकी साख गिर जाती है और फिर वह दोबारा ऋण देने के लिए सही नहीं माने जाते। ऐसे ऋण लेने वाले अगर एक बैंक में कसूरवार होते हैं तो उनकी साख सब बैंकों में गिर जाती है क्योंकि बैंक आपस में इस खबर को सांझा कर लेते हैं। बैंक जैसा ऋण दाता तो माता, पिता, भाई, बहन या दोस्त भी नहीं हो सकता। इस लिए यह हर किसी के आपने हित में है कि बैंक का ऋण सही समय पर और ब्याज समेत वापिस कर दिया जाए और अपनी साख बना कर रखें। अगर आप को किसी कारण से ऋण देने में दिक्कत आ रही है तो आप बैंक में जाकर अपनी दिक्कत बता दीजिए। बैंक उसका कोई ना कोई समाधान अवश्य कर देगा। किश्त निलंबित हो सकती है। या ब्याज निलंबित हो सकता है इत्यादि। बैंक से वार्तालाप कायम रखना चाहिए।  


बैंक ऋण देने का जोखम ले लेते हैं और उनके पास ऋण देने की क्षमता भी होती है और ऋण देकर वसूल करने की कला भी। फिर भी बैंको के कई ऋण बट्टे खाते में चले जाते हैं और उस के लिए उन्हें कोर्ट कचहरी में भी जाना पड़ता है। सरकार ने प्रावधान कर रखे हैं कि बैंक चूककर्ता की संपत्ति भी जब्त कर सकते हैं। छोटे ऋण खातों में  चूक हो जाने से भी बैंको को कुछ राहत मिलने का प्रावधान है। परंतु ऋण लेने वालों को यह ख्याल रखना चाहिए कि बैंक ऋण लेकर वापिस ना करने से आज तक कोई अमीर नहीं बन पाया और ना ही बच पाया। असल में किसी को भी धोखा देकर कोई महान नहीं बन पाया। कुछ लोग उद्धहरण दे सकते हैं कि विजय माल्या बैंकों का ऋण मार कर लंदन में निवास कर रहा है। असल में देखा जाए तो इतने बड़े व्यापार का मालिक चूहे की तरह छुप कर बैठा है। और उस की संपत्ति जपत हो गई है। और चूहे की मां कब तक खैर मनाएगी। ऐसे ही और कई महारथी धराशाही हो गए जिन्होंने बैंकों से धोखा करने की सोच रखी। 


बैंक जैसा ऋण दाता कोई नहीं। इस लिए बैंक में अपनी साख बनाकर रखने में ही हित है। बैंक को आपने जीवन का, व्यापार, उद्योग और खेती का हिस्सेदार बना कर रखो। बैंक आपका साथ देने को हमेशा तत्पर रहते हैं। बल्कि यही उनका व्यापार है।


सतीश कालड़ा

बैंगलोर

11.11.2021



 



Tuesday, November 16, 2021

बैंक: भरोसे के प्रतीक


 बैंक: भरोसे के प्रतीक



चार दशक तक (1974 से 2013) बैंक में नौकरी की। फिर एक बिज़नेस स्कूल में बैंकिंग डिपार्टमेंट की स्थापना की। पिता जी भी बैंक में थे और दादा जी भी।  भाई भी बैंक में था।  ताया  जी और चाचा  जी ने भी बैंक की नौकरी ही की। कुछ समय के लिए बेटे ने भी बैंक में नौकरी की।  बैंक की नौकरी जैसे पारिवारिक  पहचान हो गई।  आज बैंक के बारे में कुछ विचार साँझा करता हूँ।  


धन व्यक्ति को बहुत प्रिय होता है। वह उस को संभाल कर रखना चाहता है। चोरी हो जाने का डर भी बना रहता है। घर में पड़ा हो तो फिजूल खर्च भी हो जाता है। हमें चाहिए एक ऐसी संस्था जो हमारे धन को सुरक्षित रखे और जब चाहिए वापिस भी कर दे। बैंक ही ऐसी संस्था हैं जो ऐसा करती है। बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के अनुसार बैंक वह संस्था है जो धन राशि को लेकर यह वायदा करती है कि जब भी जमाकर्ता को चाहिए उसे वापिस दे देगी।   


क्या सिर्फ कानून बना देने से कोई संस्था भरोसेमंद हो सकती है। नहीं। इस के लिए आवश्यक है कि बैंक इस तरह के नियम और कार्यप्रणाली अपनाएं जिस से बैंक धन को सुरक्षित रख सकें और जब भी जमाकर्ता को चाहिए उसे उपलब्ध करवा सके। क्या मात्र नियम और कार्यप्रणाली बनाने से बैंक भरोसे के प्रतीक हो सकते हैं। नहीं। बैंक में कार्य करने वाले व्यक्ति भरोसे के प्रतीक होने चाहिए। तभी यह संभव है। 


आजकल भारत में 135 बैंक हैं जिनमें से 12 राष्ट्रीकृत बैंक हैं और 23 निजी क्षेत्र के बैंक। अधिकाँश बैंक कारोबार इन के पास ही है।  इस के अतिरिक्त 15 छोटे और पेमेंट बैंक हैं, 43 विदेशी बैंक और 42 कोआपरेटिव बैंक हैं। क्या देश में सब को बैंक सुविधा सुलभ है? इस मामले में हाल के वर्षों में काफी उपलब्धि हुई है परन्तु अभी भी काफी कुछ करना बाकी है।   अधिकांश हर कसबे और शहर में हर गली बाजार में कोई ना कोई बैंक अवश्य है। देश की 2.50 लाख पंचायतों में अधिकाँश में बैंक है और जहाँ नहीं है वहां पर बैंकों ने आपने प्रतिनिधि बैठा रखें हैं लेन देन करने के लिए।  डाक खानों को भी बैंक सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए कहा गया है।  


परंतु यह सब पर्याप्त नहीं। देश के नागरिक को बैंक सिर्फ इस लिए नहीं चाहिए कि वह अपना धन वहां सुरक्षित रख पाए। उसे इस लिए भी बैंक चाहिए कि वह धन का स्थानातरण कर पाए और समय समय पर ऋण भी चाहिए। और भी वित्तीय सेवाएं चहिए जो बैंक में तो नहीं परंतु चाहिए। पेंशन चाहिए, बीमा चाहिए। 


सन  2000 में मैं पंजाब नेशनल बैंक की दिल्ली में चांदनी चौक शाखा का मुख्य प्रबंधक था। मैंने देखा कि दिल्ली, जो कि देश की राजधानी है और चांदनी चौक जो इस का मुख्य व्यवसाय केंद्र है उस में अनेकों मजदूर सड़क पर सोने को मजबूर थे। सारे दिन की कमाई अगर वह आपने पास रखते तो कोई गुंडा आ कर ले जाता। उन के बैंक खाते कम ही खुलते थे। वह मजबूरन आपने सारे दिन की मेहनत की कमाई किसी दुकानदार के पास रखते और इस  के लिए उन्हें फीस देनी पड़ती थी। फिर अगर इन को यह धन आपने गांव भेजना होता था तो उस की अलग फीस। 2014 में देश में जनधन स्कीम लागू होने के पश्चात इनको कुछ राहत मिली है। 


असल में देखा जाए तो भारत में आधुनिक बैंक 200 वर्ष से कम समय से हैं। अंग्रेजों ने आधुनिक बैंक स्थापित किए। शुरू शुरू में तो बैंक सुविधा मात्र अंग्रेजी कंपनियों को ही उपलब्ध थी या उन को जो अंग्रेजी कंपनियों के साथ व्यापार करते थे। 1895 में देश के स्वंत्रता सैनानियों ने पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना इस उद्देश्य से की कि भारतीय मूल के व्यापारी भी बैंक सुविधा का लाभ ले पाएं। 1969 में देश के 14 मुख्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया तो बैंक सुविधा किसानों और लघु उद्यम को भी उपलब्ध हुई। 2010 से चालू और 2014 से और जोर से चालू कर जन धन स्कीम कार्यरत हुई। अब बैंक सुविधा जनसाधारण को सुलभ है। परंतु ऋण, पेंशन और बीमा अभी पूरी तरह से नहीं। 


गत 125 वर्ष के बैंक इतिहास का मैं और मेरे पूर्वज साक्षी हैं। कुछ दंतकथाएं मैने आपने दादा और पिता जी से सुन रखी हैं और 1974 से तो मैं खुद गवाह हूं। अब से कुछ लेख लिख कर मैं बैंक के 125 वर्ष के इतिहास की कुछ रोचक आपबीती सांझा करूंगा। आशा करता हूं आप को पसंद आएगी।


सतीश कालड़ा

बैंगलोर

05.11.2021