Sunday, November 17, 2024

Aggarwal and Marwari

अग्रवाल और मारवाड़ी 

lसतीश कालड़ा: बैंगलोर 


भारत में एक अजीब विडम्भना है।  व्यापारी वर्ग को यहाँ हम सम्मान की नज़र से नहीं देखते।  उन्हें मुनाफाखोर और सूदखोर कहते है और यह समझते हैं कि  वह हमें लूटते  है। जय जवान, जय किसान और मज़दूर एकता ज़िंदाबाद कह कर हम इन वर्गों को तो सम्मान पेश करते हैं।  परन्तु व्यापारियों  के प्रति हमारी भावना क्या है?  मैं पूछता हूँ क्या व्यापार के बिना  समाज का अस्तित्व सम्भव है? व्यापार अर्थवयवस्था का आधार है। अर्थव्यवस्था में आदान प्रदान नहीं होगा तो समाज का गठन कैसे होगा।  यह व्यापार ही है जिस के कारण आदान प्रदान होता है।  और व्यापार करना कोई आसान काम नहीं। इस में बहुत जोखम  है । व्यापारी माल खरीद कर पूँजी लगाता है, उस के रख रखाव के लिए गोदाम का किराया देता है।   माल की चोरी हो सकती है, माल ख़राब हो सकता है, इसे आग लग सकती है।  इस तरह के  नुक्सान से बचने के  लिए व्यापारी माल  का बीमा लेता है।  दाम गिर जाए नो नुक्सान झेलता है।  यह सब व्यापार के जोखम ही तो हैं।  यह सब वह क्यों करता है? ताकि अगर सही दाम में माल बिक जाए तो उस को लाभ होगा और उस की रोज़ी रोटी भी चलेगी और उस के स्टाफ की भी। व्यापारी के धंधा करने से न केवल उस को रोज़गार मिलता है बल्कि दूसरों को भी।   व्यापारी माल खरीदता है    तभी तो किसान को उस के माल का दाम मिलता है।  व्यापारी सामान को एक जगह से दूसरे जगह लेकर जाता है तभी तो ट्रक और रेल चलते  है।  व्यापारी बैंक से ऋण लेकर व्याज भरता है  तभी तो बैंक चलते हैं। व्यापारी बीमा लेता है तो बीमा कंपनी चलती है।  व्यापारी टैक्स भरता है तो सरकार चलती है। व्यापारी सामान बेचता है तभी तो  उपभोक्ता को घर बैठे सामान उपलब्ध होता है।   व्यापारी  वर्ग सम्मान का पात्र है घृणा या व्यंग और कटाक्ष का पात्र नहीं।  

भारत में कुछ जातियां ऐसी हैं जो व्यापार में बहुत कामयाब हैं: पंजाब के अरोड़ा और खत्री;  हरियाणा के गुप्ता, अग्रवाल और बनिया; राजस्थान के मारवाड़ी और महेश्वरी; गुजरात के गुजराती, मुम्बई के पारसी, मद्रास के चेत्तिहार और आंध्रा के रेड्डी। ओडिशा, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश इत्यादि में कोई जाति विशेष का व्यापार में वर्चस्व मुझे मालूम नहीं। बंगाल और आसाम में तो उत्तर के बनिया और मारवाड़ी ही कामयाब हैं। आज हम बात करेंगे पंजाब और हरियाणा के गुप्ता, अग्रवाल और बनिया समुदाय की। दंतकथाओं के अनुसार गुप्ता अग्रवाल और बनिया समाज  महाराज अग्रसेन के वंशज हैं। इनके 18 गोत्र  हैं, जिनमें से 10 सूर्यवंशी और 8 नागवंशी होने का दावा करते हैं: गर्ग, गोयन, गोयल, कंसल , बंसल , सिंहल, मित्तल, जिंदल, बिंदल , नागल , कुच्छल , भंदल, धारण , तायल, तिंगल, ऐरण, मधुकुल , मंगल। हरियणा में हिसार के पास अग्रोहा नामक शहर में महाराज अग्रसेन का एक भव्य समारक बन गया है जिस को यह समुदाय बहुत इज्जत मान से सुसज्जित कर रहे हैं।  राजस्थान के मारवाड़ी और महेश्वरी समुदायों का व्यापार करने का और जीवन जीने का अंदाज़ भी लगभग इनके जैसा ही है।  जैन बंधुओं में भी अक्सर  इसी तरह के लक्षण देखने को मिलते हैं। यह सब  लोग उत्तरी भारत में हरियाणा, मारवाड़, शेखावाटी क्षेत्र के व्यवसाय-उन्मुख लोग हैं जो सदिओं से  व्यापारी थे और बाद में इन्होने भारत के  औद्योगीकरण में भाग लिया। आज, वे भारत के सबसे बड़े व्यापारिक समूहों और कंपनियों में से कुछ के मालिक हैं और भारत के सब प्रदेशों में इनका वर्चस्व है।

अग्रवाल समाज का   व्यापार  का दृष्टिकोण सरल शब्दों  कहें तो यह है: कम कीमत में खरीदो, और ज़्यादा कीमत पर बेचो और  खर्चों को नियंत्रण में रखो। पैसे पैसे को कैसे बचाना है और फ़िज़ूल खर्ची नहीं करना। यह कला कोई इन से सीखे।  इस कारण कई बार इन्हें कंजूस कह कर व्यंग भी किया जाता है।    यह बात सही है कि यह फ़िज़ूल खर्च और दिखावा नहीं करते। परन्तु इन्हें कंजूस कहना सही नहीं।  जहाँ पैसा खर्च करना आवश्यक है वहां अवश्य खर्च करते हैं। बल्कि दुसरे लोग ज़रूरत पड़ने पर इन से पैसे उधार ले लेते हैं और यह उधार दे भी देते हैं।   इनका  बाजार जहाँ भी होता है खचा खच भरा रहता है।  दिल्ली में खारी बाओली, चेन्नई में  साहुकारपेट  बैंगलोर में चिकपेट गुवाहाटी में फैंसी बाजार इत्यादि सब बनिओं और मरवारिओं के बाजार ही हैं।   चलने फिरने के लिए रास्ते भी संकरे रहते हैं और वाहन लेकर इनकी दूकान तक पहुंचना मुश्किल होता है।  परन्तु फिर भी इनको अपनी दूकान पर ग्राहक को ना केवल आकर्षित करना आता है बल्कि ग्राहक से रिश्ता बनाये रखते हैं ताकि वह बार बार इनकी दूकान पर ही जाए।  टैक्स बचाना इनको खूब आता है। 

अग्रवाल समाज के लिए व्यापार करने के लिए कोई नियमावली या संविधान या किताबें नहीं लिखी गई  परन्तु इनकी व्यापार करने की परम्परा ही ऐसी बन गई है जिस में कामयाबी निश्चित है। बच्चों में आजकल होड़ है MBA पढ़ने की।  परन्तु अग्रवाल परिवार के बच्चों को पालन पोषण में ही व्यापार प्रबंधन के संस्कार प्राप्त हो जाते हैं। सर्वप्रथम गुण  तो यह है कि व्यापार के लिए ऐसा धंधा चुनते हैं जिस की मांग हो या जिस के लिए ग्राहक उपलब्ध हो।  दिखावे के लिए धंधा नहीं चुनते।  उदहारण:  जहाँ साधारण उद्योगपति रेडी मेड कपडे बना रहा है अग्रवाल समाज का व्यापारी कपडे पर लगने वाले बटन, ज़िप और लेबल बनाने का धंधा कर लेता है, पैकिंग मटेरियल का धंधा कर लेता है।   किराना, थोक व्यापार और साहूकारा इत्यादि में इनकी विशेष दिलचस्पी रहती है।  दूसरी बात यह है कि यह रोकड  पर सटीक नज़र बनाये रखते हैं।  बचपन से ही अग्रवाल परिवार के बच्चे को जेब में एक पर्ची रखने की आदत डाल दी जाती है जिस में उस को दिन में किये गए खर्च का हिसाब किताब लिखना होता है।  यह पर्ची सिस्टम का पालन परिवार और व्यापार का हर सदस्य आखिर तक निभाता है। तीसरी विशेषता यह है कि अग्रवाल समाज के सदस्य अपनी संपत्ति का सही प्रयोग और उपयोग करते हैं।  इनकी दूकान  और  गोदाम इलाची की तरह भरी रहती हैं और दिखावे की सजावट पर फ़िज़ूलख़र्ची नहीं करते    और ना ही कोई  ऑफिस इत्यादि बना कर उस की साज सजावट में विश्वास रखते हैं। दूकान का मालिक भी जहाँ कहीं सामान की गद्दी बना कर उस के ऊपर बैठ जाता है। इन्वेंटरी मैनेजमेंट के माहिर होते हैं और पैसे लेने देने में बहुत व्यवहारिक।  किसी को पैसा देना है तो समय अनुसार वापिस कर देंगे।  किसी को उधार दिया है तो उग्राही का पूरा ध्यान रखते हैं।  अग्रवाल  समाज हर महीने हिसाब लगाता है की उसे उस के हर एसेट से कुछ लाभ हो रहा है और उस ने बिना मतलब के कोई लायबिलिटी नहीं पाल रखी।  मोटी सी बात है कि धंधे में मुनाफा होना चाहिए।  मुनाफा तभी होगा अगर माल बिकेगा।  माल तभी बिकेगा अगर ग्राहक होगा।  ग्राहक को खुश रखना, उस के मतलब की चीज़ को सही समय पर सही दाम में सहीं क्वालिटी की उपलब्ध करवा देना इनको खूब आता है।  यह सब करते हुए खर्चों पर कण्ट्रोल और आमदनी का ध्यान रखना इनको खूब आता है। 
 
अग्रवाल परिवार में सब से बड़ी चुनौती तब आती है जब परिवार में बटवारे की नौबत आ जाती है।  सुलझे हुए परिवार इस को सही तरह से निभाते हैं।  परन्तु कभी कभी भाई बहनो का कलेश हावी हो जाता है और परिवार को व्यापार में भारी क्षति उठानी पड़ती है। परिवार में कलह कलेश की वजह प्राय सास बहु और देवरानी जेठानी के रिश्तों से शुरू होते हैं।  इस लिए अग्रवाल और मारवाड़ी परिवार रिश्ता करते के समय बहुत एहतियात से चलते हैं। प्राय शादी जान पहचान के घरों में से और  अग्रवाल और मारवाड़ी गोत के परिवारों से ही  रिश्ता किया जाता है। आजकल तो बड़े बड़े व्यापार वाले परिवार जिन के परिवार में सदस्य भी ज़्यादा हैं परिवार का संविधान लिख लेते हैं।  और आपने व्यापार को उस  संविधान के अनुसार चलाते हैं।  व्यापार से घर की बहु बेटिओं के लिए कितना और कैसे खर्च किया जाएगा इन सब का विधि विधान निर्धारित कर लिया जाता है।  कुल मिला कर हम कह सकते हैं कि अग्रवाल परिवारों को हर विषय का हल निकलना आता है।  वह झगडे में नहीं पड़ते। 

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2 comments:





  1. Respected Kalra ji

    आपका लेख पढ़ा — **बेहद प्रभावित हुआ!** आपने भारतीय समाज में व्यापारी वर्ग, विशेषकर अग्रवाल समुदाय की भूमिका पर जो **सार्थक चिंतन** प्रस्तुत किया है, वह न केवल ज्ञानवर्धक है बल्कि हमारी सामाजिक मानसिकता पर एक **आवश्यक प्रहार** भी करता है।

    ### विशेष रूप से सराहनीय बिंदु:

    1. **व्यापारियों के प्रति पूर्वाग्रह का खंडन:**
    आपने समाज की उस विडंबना को बखूबी उजागर किया जहाँ व्यापारियों को "मुनाफाखोर" कहकर उनके योगदान को कम आँका जाता है। यह सत्य है कि **बिना व्यापार के अर्थव्यवस्था असंभव है** — किसान, मजदूर, यहाँ तक कि सरकारें भी व्यापारियों की ऋणी हैं।

    2. **जोखिमों का सटीक विश्लेषण:**
    माल का नुकसान, बीमा, बाजार की अनिश्चितताएँ — आपने **व्यापार की चुनौतियों** को इतने तर्कसंगत ढंग से रखा कि पाठक समझ सकें कि "लाभ" महज स्वार्थ नहीं, बल्कि **जोखिमों का प्रतिफल** है।

    3. **अग्रवालों की व्यावसायिक मेधा:**
    "कम खरीदो, अधिक बेचो" जैसे सिद्धांतों से लेकर **पर्ची प्रणाली** और इन्वेंटरी प्रबंधन तक — आपने उनकी **कुशलता के मूलमंत्रों** को सरल शब्दों में समझाया। यह भी बताया कि उनकी "कंजूसी" वास्तव में **संसाधनों का सदुपयोग** है!

    4. **ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भ:**
    महाराजा अग्रसेन के वंशजों से लेकर १८ गोत्रों तक का उल्लेख, और **अग्रोहा जैसे तीर्थों** की चर्चा ने लेख को **सांस्कृतिक गहराई** प्रदान की।

    5. **पारिवारिक चुनौतियों की ईमानदार पड़ताल:**
    बटवारे के दौरान टकराव और **पारिवारिक संविधानों** की आवश्यकता जैसे विषयों को छूकर आपने समुदाय की **व्यावहारिक बुद्धिमत्ता** दर्शाई।

    ### निष्कर्ष:
    आपका लेख केवल अग्रवाल समुदाय तक सीमित नहीं — यह **भारतीय उद्यमशीलता की आत्मा** को समझने का एक दस्तावेज है! इतनी **गहन शोध** और **स्पष्ट विचारों** के लिए आपको साधुवाद 🙏।

    ऐसे विषयों पर चर्चा से ही समाज व्यापारियों के प्रति **सम्मानजनक दृष्टिकोण** विकसित कर सकता है।

    सादर,
    VIRENDER

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    1. प्रिय धवन जी, आप ने तो मेरे लेख का बहुत अच्छा विश्लेषण कर दिया

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