बैंक में सब से अधिक भरोसेमंद पद: कैशियर
बैंक में सब से अधिक भरोसेमंद पद होता है कैशियर का। बैंक में हर तरह की धन दौलत होती है परंतु विशेषत नकद कैश प्रचुर मात्रा में होता है और उस को कैशियर ही संभालते हैं।
कहीं से कोई ऐसी दवा दारू नहीं मिलती जिस को पिला दिया जाए तो स्टाफ संस्कारी, जिम्मेदार और भरोसेमंद हो जाए। इस के लिए संस्था में कल्चर बनाना पड़ता है। बैंकों में ईमानदारी को इनाम मिले या ना मिले परंतु बेइमानी के लिए जीरो टॉलरेंस की पॉलिसी अपनाई जाती है। ऐसा नहीं कि बैंकों में कभी कोई बेइमानी की कोशिश नहीं करता। जहां गुड होता है मक्खियां आ ही जाती हैं। किसी के दिल में लोभ लालच आ भी सकता है। किसी की गलती तो माफ हो सकती है परन्तु बेइमानी कतई नहीं।
कैशियर बनते ही उसे संस्कार दिए जाते हैं। कोई किताब के पाठ नहीं पढ़ाए जाते। बल्कि बैंक के वर्तमान कैशियर नए कैशियर को सीख देते हैं भरोसेमंद होकर रहने की। बैंक में इतना कैश होता है कि जैसे सब्जी मंडी में व्यापारी के आगे सब्जी का ढेर। परंतु कैशियर के लिए वह सारा कैश कागज़ के टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं। जिस तरह जल में रहते हुए भी कमल के पत्ते के ऊपर जल नहीं टिकता इसी तरह कैशियर के मन को बैंक के कैश से निर्लिप्त भाव रहता है। हो सकता है उस की जेब में घर जाने के लिए बस का किराया भी ना हो। परंतु बैंक के कैश से वह निर्लिप्त ही रहता है।
बैंक कैश के ऊपर चोर लुटेरों की नज़र भी रहती है परंतु आजतक कोई चोर या डाकू बैंक नकदी लूट कर बच कर नहीं पाया। देश में सब से बड़ा डाका पंजाब नैशनल बैंक लुधियाना की एक शाखा में पड़ा था। बैंक में 15 करोड़ कैश था। लुटेरों ने 5.70 बोरियों में भर लिया। और उनके पास कैपेसिटी नहीं थी। लुटेरे जब पकड़े गए तो उन्हों ने बताया कि उन्हों ने स्टाफ को खुली छूट दी कि जिस को जितना कैश चाहिए ले लो। परंतु स्टाफ की ईमानदारी थी कि उन्हों ने एक रुपया भी नहीं लिया।
नकली कैश की चपेट में कई कैशियर आ जाते हैं। वैसे तो काम करते करते कैशियर को असली नकली की खूब पहचान हो जाती है। परन्तु दुश्मन देश कई बार नकल भी असल जैसे बना देते हैं। पुलिस नकली कैश पकड़े जाने पर कैशियर को बहुत तंग करती है। कई बार तो मामला हाई कोर्ट तक जाता है।
बैंक का कैशियर आसानी से छूटी नहीं ले सकता क्योंकि उस के पास बैंक कैश का चार्ज होता है और उसे रोज समय पर जाकर कैश सेफ खोलना होता है ताकि किसी ग्राहक को दिक्कत ना हो। अगर उसे छूटी लेनी हो तो उसे सारे कैश का चार्ज किसी और को देना होता है तभी वह छूटी ले पाता है।
एक ज़माना था कि बैंक का कैश ठेकेदार के हवाले कर दिया जाता था। कैश कम हो या ज्यादा ठेकेदार की जिम्मेदारी रहती। कैश महकमें के मुलाज़म भी ठेकेदार के होते थे। ठेकेदार देख भाल कर उन को नौकरी देता था। 1923-40 के दशकों में मेरे दादा जी पंजाब नेशनल बैंक, लाहौर में कैश कांट्रेक्टर हुआ करते थे। आजकल भी इस का कुछ रूप सामने आया है। जनधन स्कीम के तहत बैंको ने बिजनेस कॉरेस्पोंडेनट (BC) नियुक्त किए हैं। BC आपने कैश का खुद जिम्मेदार होता है। BC के पास जो कैश जमा होता है उस के व्यक्तिगत खाते से उतना धन निकाल दिया जाता है और जब वह कैश का भुगतान करता है तो उस के खाते में उतना धन जमा कर दिया जाता है।
सतीश कालड़ा
बैंगलोर
06.11.2021
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